वार्ता : चैतन्य रहना ज़रूरी - 1
(दोनों सूपर-मून को देख रहे हैं)
अरुण : रुका हुआ जल (मन) ही सड़ता है.
अमन : हाँ! इसीलिये तो चलते रहना ज़रूरी है.
अरुण : आप व्यर्थ चलते रहेंगे क्या? कुछ पता भी तो हो कि किस दिशा में चलते रहना है? इधर-उधर जहाँ आकर्षक मार्ग मिले, या जहाँ रास्ता आसान लगे, उधर ही चलते रहे क्या? या जिधर ढलान मिले उधर ही लुढ़कते रहें? क्या यही ठीक है?
अमन : नहीं ! नहीं ! अब मैं समझा. प्रयोजन की प्ररणा भी तो आवश्यक है.
अरुण : और क्या सिर्फ़ मंज़िल और उसकी दिशा पता चल जाना काफी है? एक ही मंज़िल के या एक ही दिशा में तो कई मार्ग हो सकते हैं? आप सब पर तो नहीं चल सकते. उनमें सही या सम्यक मार्ग कौन-सा है, क्या यह जानना ज़रूरी नहीं? 'मार्ग' कौन-सा चुनें, क्या यह पता होना ज़रूरी नहीं?
अमन : अरे! हाँ! हाँ! हाँ! मार्गदर्शक भी तो आवश्यक है.
अरुण : पहले एक 'हाँ', फिर दो 'नहीं', फिर तीन 'हाँ'... 'चक्कर' क्या है? क्योंकि 'अखण्डमण्डलाकार' तो कम ही होता है... ये क्या गिनती चल रही है? ... 'एस्ट्रोलॉजी' में यकीन रखते हो क्या..?
अमन : अरे! आप स्वयं एस्ट्रोलॉजर होकर ऐसे कह रहे हैं!
अरुण : लोग मुझे एस्ट्रोलॉजर कह देते हैं, वास्तव में मेरी नज़रों में मेरी एक पहचान 'ज्योतिषी' की है... एस्ट्रोलॉजर की नहीं..
अमन : एस्ट्रोलॉजी और ज्योतिष... ये तो एक ही बातें हैं... खैर छोड़िये, पहेलियाँ बूझना आपकी आदत है..
अरुण : हम्म ! और कुछ?
अमन : हाँ न!
अरुण : हाँ? या ना?
अमन : अरे! मात्रा देखिये, मात्रा! हाँ! भई हाँ!
अरुण : क्या?
अमन : म..मैं.. असल में यह पूछना चाह रहा था.. देखिये हँसियेगा नहीं.. अगर मंज़िल पर पहुँच ही गए तो उसके बाद क्या?
अरुण : ?
अमन : मतलब चलते रहना तो ज़रूरी है न... रुका हुआ पानी तो सड़ता है न?
अरुण : मैं चेतना-मन्त्र करने जा रहा हूँ...
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(वैशाख पूर्णिमा वार्तालाप)
~ अरुण सिंह 'क्रान्ति'